Shri Swami Sant Ram ji Maharaj



He took shelter under Shri Satguru Bhuriwale Braham Sagar ji Maharaj and became his disciple in 1918. He remained in service of his Gurudev ji upto 1947. During this time under the command of Satgurudev Ji, he wrote “Bani” of Shri Garib Dass ji in the form of Shri Granth Sahib and completed other books like “Rattan Sagar", "Ratan Mala” etc. He did tap in “Doie wale jungle” along with Satgurudev Bhuriwale ji and also performed duty as his guard. He came to Ram Pur the native village of Satgurudev Bhuriwale ji in December 1948. He did “Tap” and “Bhajan” for many years in his small hut made of grass and hay. During this tap, some times he had only roasted grams as his food.

The present Tap Sthan was constructed and completed with your initiative in 1957. You remained there upto 1973 while performing your tap, bhajan and service to this temple. You came in Ram Pur Dham with only one mission to bring in light the Avtar Sthan of Satguru Bhuriwale ji which was great tirath but was unknown. This is due to your tap, bhajan and sincere efforts only that the present temple is before us for worship. You advised and motivated your followers to dedicate all their services to the Avtar Sthan. You always told the sangat that the any service made to this temple shall be considered as service to me. You did a great miracle by establishing and revealing this beautiful Tirath “Avtar Sthan of Shri Bhuriwale Maharaj ji” at Ram Pur Dham. You did great service to mankind and your followers because of the tap and bhajan made by you at this place.

You left your body by sitting in Yog-Kirya in March 1973 at 2.00 A.M. Now in your memory on the eve of Maha Shivratri every year 3 days path of Amritmye bani of Shri Garib Dass ji is arranged by Sangat and Trust.



श्री सतगुरु ब्रह्मसागर जी भूरीवाले महाराज जी के श्री चरणों में उनके परम शिष्य श्री स्वामी सन्त राम महाराज जी संध्या आरती के पश्चात हर रोज हाथ जोड़कर प्रारथ्ना करते थे। यह तीन साखी बिनती करते हुए स्वामी सन्त राम महाराज जी के श्री मुख से उचारण हुर्इ हैं :-


श्री सतगुरु ब्रह्मसागर जी के आगे बिनती


हाथ जोड़ विनती करूं, सुन गुरु कृपा निधान।
सतगुरु ब्रह्मसागर जी के, मैं चरण कमल का ध्यान।।
ध्यान धरे संकट कटे, दर्शन से दुख जाय।
सतगुरु ब्रह्मसागर जी के, मैं चरण कमल की छाय।।
सतगुरु ब्रह्मसागर जी के, मैं आगे करुं पुकार।
सन्त दास गुलाम की, पत्त रखियो बहुत संभार।।


सरलार्थ :- श्री स्वामी सन्त राम महाराज जी कहते हैं कि हे सतगुरु ब्रह्मसागर भूरीवाले महाराज जी! मैं हाथ जोड़कर आप जी के समक्ष बिनती करता हूँ कि हे गुरुदेव! आप कृपानिधान हैं, कृपा के सागर हैं। मैं आप जी के पावन चरण कमलों का ध्यान करता हूँ किऊँकी आप जी के पावन चरण कमलों का ध्यान करने से प्राणी के सभी संकट कट जाते हैं। आप जी के पावन स्वरुप के दर्षन करने से प्राणी के सभी दु:ख दूर हो जाते हैं। हे गुरुदेव ब्रह्मसागर जी महाराज! मुझे आप जी के चरण कमलों की ही ओट और सहारा है। हे गुरुदेव ब्रह्मसागर जी मेरी आप जी के समक्ष पुकार है कि आप जी ने इस संतराम गुलाम सेवक की अपने दरबार में पत्त (लाज) संभाल कर रख लेना।


व्याख्या:- सतगुरु शब्द साहिब का ही दूसरा नाम है। अत: इस शब्द का दरजा बहुत ऊँचा है। किसी भी सिद्ध साधक प्राणी को सतगुरु कहिकर संबोधन करना अनुचित है। सतगुरु श्री गरीबदास जी महाराज जी इस शब्द की व्याख्या करते हुए कहते है :-


गरीब, बैठे अनहद तख्त पर, सुशमन ध्यान समोय।
सतगुरु साहिब एक हैं, कहन सुनन कूँ दोय।।


अर्थात जो आत्मा पंच भौतिक शरीर में भी विराजमान है और सुखमना के मारग से अनहद पुरी के तख्त पर भी विराजमान है, उसे साहिब कहो चाहे सतगुरु कहो दोनों नाम एक ही ब्रह्रा के हैं। अत: ऐसे पूर्ण पुरुष के आगे बिनती करने से प्राणी का आवागमन मिट जाता है। पुज्य स्वामी संतराम महाराज जी के मुख से निकले हुए यह बिनती के शब्द बडे़ रहस्य भरें हैंं जो सेवक सतगुरु जी को पूर्ण ब्रह्रा का रुप मानता हुआ प्रतिदिन उनके चरणों में बिनती करता है, उस का अवष्य ही आवागमन मिट जाता है। पुज्य स्वामी जी के मुख से निकली हुर्इ यह वाणी हमें पूर्ण पुरुष सतगुरु जी के चरणों मे जोड़ती है। सतगुरु जी ही समरथ हैं कि किसी भी प्राणी के ऊपर दया करके अपने दरबार में उस की पत्त (लाज) रख लें।